Friday, May 27, 2022
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भाजपा में स्वामी प्रसाद मौर्य की जगह भर पाएंगे आरपीएन?

  • Updated on 1/25/2022

नई दिल्ली/नेशनल ब्यूरो। पूर्वांचल की पिछड़ी जाति के बिगड़ते जातीय गणित को साधने के लिए भाजपा ने मंगलवार को बड़ा दांव खेला है। स्वामी प्रसाद मौर्य के पार्टी छोड़ कर जाने से हो रहे नुकसान को बचाने के लिए भाजपा ने कांग्रेस के कद्दावर नेता आरपीएन सिंह को अपने साथ जोड़ लिया। लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या स्वामी प्रसाद मौर्य की जगह आरपीएन भर पाएंगे?

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आरपीएन सिंह कुशीनगर के पडरौना के शाही परिवार से आते हैं। वे सैंथवार जाति से हैं, जो पिछड़ी जाति में आती है। पिछड़ी जाति के ही स्वामी प्रसाद मौर्य कुशवाहा समाज से हैं, जिनकी पूर्वांचल में अच्छी खासी तादाद है। स्वामी प्रसाद ने 2017 के चुनाव से कुछ पहले ही बसपा छोड़ कर भाजपा का दामन थामा था और पडरौना विधानसभा से जीत कर योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री बने थे। इसके पहले वे बसपा सरकार में भी मंत्री रहे थे। पिछले महीने स्वामी प्रसाद ने योगी सरकार के साथ-साथ भाजपा से इस्तीफा दे दिया और समाजवादी पार्टी ज्वाइन कर ली। उनके साथ दारा सिंह और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धर्म सिंह सैनी समेत पिछड़ी जाति से आने वाले कई नेताओं ने भाजपा छोड़ दी। पिछड़ों की राजनीति करने वाले ओम प्रकाश राजभर भी भाजपा से नाराज होकर अलग हो गए और सपा के साथ गठबंधन कर चुनाव मैदान में हैं। चुनाव से ठीक पहले हुए इस घटनाक्रम का सियासी संदेश यह गया कि पिछड़ी जाति के लोग भाजपा से नाराज हैं। सियासत में परसेप्शन की अहमियत है। भाजपा को पिछड़ी जाति के वोट बिखरते और खिसकते दिखने लगा। इसे संभालने को पार्टी ने कांग्रेस में सेंधमारी की और पूर्वांचल से आने वाले रतनजीत प्रताप नारायण सिंह (आरपीएन सिंह) को अपने पाले में ले लिया। 

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आरपीएन सिंह यूपीए सरकार में केंद्र में मंत्री रहे। 1996, 2002 और 2007 में पडरौना विधानसभा सीट से विधायक रहे। उत्तर प्रदेश युवा कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। मौजूदा वक्त में भी झारखंड प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी और पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता थे। उनके पिता सीपीएन सिंह कुशीनगर से सांसद रहे और इंदिरा गांधी सरकार में केंद्रीय रक्षा राज्यमंत्री रहे थे। पिता की विरासत को संभालते हुए आरपीएन ने भी कुशीनगर की सियासत पर अपनी पकड़ बनाई। देवरिया, गोरखपुर तक अपना प्रभाव कायम किया। 2009 में पडरौना लोकसभा सीट पर पहली बार वे चुनाव लड़े तो उनका सामना बसपा प्रत्याशी रहे स्वामी प्रसाद मौर्य से हुआ। आरपीएन ने मौर्य को इस चुनाव में हरा दिया। सांसद बनने के बाद आरपीएन ने पडरौना सीट पर अपनी मां को उपचुनाव लड़वाया तो स्वामी प्रसाद मौर्य ने उनका सामना किया और यह सीट जीत ली। तब से पडरौना सीट लगातार स्वामी प्रसाद मौर्य ही जीतते आ रहे हैं। आरपीएन सिंह 2014 और 2019 का लोकसभा चुनाव हार चुके हैं। 

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भाजपा ज्वाइन कर चुके आरपीएन को अगर पार्टी पडरौना से विधानसभा चुनाव लड़ाती है तो उनका सामना स्वामी प्रसाद मौर्य से हो सकता है। मौर्य सपा के टिकट पर इस सीट से फिर ताल ठोक रहे हैं। यह मुकाबला देखना दिलचस्प रहेगा। हालांकि जानकारों का कहना है कि भाजपा केवल उस परसेप्शन को तोडऩे के लिए आरपीएन को साथ लाई जो स्वामी प्रसाद मौर्य के जाने से पिछड़ी जातियों में बन रहा था। बता दें कि पूर्वांचल की करीब 156 सीटों पर पिछड़ी जाति के मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं। 2017 में भाजपा की ओर से अपनाई गई सोशल इंजीनियरिंग के चलते बड़ी संख्या में गैर यादव पिछड़ी जाति का मतदाता भाजपा से जुड़ा था। स्वामी प्रसाद मौर्य, ओम प्रकाश राजभर जैसे नेताओं के अलग होने से भाजपा को बड़ा नुकसान होता दिख रहा था। आरपीएन इस नुकसान की भरपाई करवा सकेंगे, यह देखना होगा।

 

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