Sunday, Jun 13, 2021
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उतार-चढ़ाव भरी रही महिला अधिकारों की लड़ाई

  • Updated on 2/18/2020

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। महिलाओं को पहली बार भारतीय सेना में 1992 में शामिल किया गया था, तब से उन्हें स्थाई कमीशन देने के मुद्दे का 28 साल का ‘उतार-चढ़ाव’ वाला इतिहास रहा है जिसमें शामिल एक दशक से अधिक समय तक अदालत में चला मामला सोमवार को उच्चतम न्यायालय की ऐतिहासिक व्यवस्था के साथ समाप्त हो गया जिसने उन्हें पुरुष समकक्षों के साथ समानता प्रदान की है। न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि तीन महीने के अंदर सेना में सभी महिला अधिकारियों को स्थाई कमीशन दिया जाए। न्यायालय ने कहा कि उन्हें कमांड में नियुक्त करने पर कोई पूर्ण पाबंदी नहीं होगी।

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42 सालों बाद पांच शाखाओं में मिला स्थान
महिला अधिकारियों को राहत देते हुए पीठ ने कहा कि सेना में महिलाओं के प्रवेश का 1992 से उतार-चढ़ाव वाला इतिहास रहा है, जब उन्हें पांच साल के लिए अनुबंधित शाखाओं और कैडर में नियुक्त किया जाता था। शुरू में 1950 के सेना कानून के तहत महिलाएं सेना में नियमित रूप से भर्ती के लिहाज से अपात्र थीं और उन्हें केवल ऐसे कोर या विभागों में नियुक्त किया जा सकता था जिसे केंद्र सरकार अधिसूचना जारी करके निर्दिष्ट कर सकती थी। कानून के लगभग 42 साल बाद सरकार ने जनवरी 1992 में अधिसूचना जारी कर महिलाओं को पांच शाखाओं में अधिकारियों के तौर पर नियुक्ति के लिए पात्र घोषित किया जिनमें सेना की डाक सेवा, जज एडवोकेट जनरल (जेएजी) विभाग, सैन्य शिक्षा कोर (एईसी), सेना आयुध कोर और सैन्य सेवा कोर शामिल हैं।

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पांच और महमकों के लिए रास्ते खुले
इसी साल दिसंबर से ही महिलाओं को पांच और विभागों में नियुक्त किया जा सकता था जिनमें सिग्नल, खुफिया, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल और मेकेनिकल इंजीनियरिंग तथा आर्टिलरी रेजीमेंट शामिल हैं। चार साल बाद, दिसंबर 1996 में एक अधिसूचना जारी करके नियुक्ति पर पांच साल की सीमा हटा दी गई और 2005 में उन महिला अधिकारियों का कार्यकाल 1997 से पांच और साल के लिए बढ़ा दिया गया जिन्हें 1992, 1993 और 1996 में महिला विशेष प्रवेश योजना (डब्ल्यूएसईएस) के तहत शामिल किया गया था। 2005 की अधिसूचना के तहत शॉर्ट सॢवस कमीशन (एसएससी) में पुरुष अधिकारियों और डब्ल्यूएसईएस अधिकारियों का कार्यकाल 14 साल तक के लिए बढ़ा दिया गया तथा स्थाई कमीशन (पीसी) वाले अधिकारियों की तरह एसएससी के पुरुष और महिला अधिकारियों, दोनों को ही पदोन्नति दी जानी थी।

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महिलाओं की नियुक्ति में महिलाओं का स्थाई कमीशन कभी पेश ही नहीं हुआ
WSES या बाद में SSC के तहत नियुक्ति से जुड़ी शर्तें महिलाओं के स्थाई कमीशन के लिए कभी पेश नहीं की गईं। हालांकि उनकी सेवा का काल शुरूआती पांच साल से बढ़ाकर अधिकतम 14 साल तक कर दिया गया। फरवरी 2013 में दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल कर सेना में एसएससी की महिला अधिकारियों को पीसी देने का अनुरोध किया गया। उसके बाद अक्टूबर 2006 में महिला अधिकारियों को स्थाई कमीशन देने के लिए याचिका दाखिल की गयी।निर्भया केस: राष्ट्रपति ने खारिज की दोषी विनय शर्मा की दया याचिका

मनमोहन सरकार ने उच्च न्यायालय के फैसले को दी थी चुनौती
रक्षा मंत्रालय ने सितंबर 2008 में एक सर्कुलर जारी किया जिसमें जेएजी विभाग और एईसी में एसएससी की महिला अधिकारियों को बाद के प्रभाव (उत्तरव्यापी) से स्थाई कमीशन देने का विचार था। सर्कुलर को कुछ महिला अधिकारियों ने इस आधार पर दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी कि इसमें उत्तरव्यापी प्रभाव से स्थाई कमीशन दिया गया है और केवल कुछ विशिष्ट कैडर में। उच्च न्यायालय ने मार्च 2010 में सरकार को सेना में उन महिला अधिकारियों को पीसी देने का निर्देश दिया जिनकी नियुक्ति पुरुष और महिला एसएससी अधिकारियों, दोनों को पीसी नहीं देने के नीतिगत फैसले से पहले की गयी थी। केंद्र सरकार ने उच्च न्यायालय के फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी।

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महिला अफसरों में खुशी की लहर
शीर्ष अदालत के इस फैसले से न्यायालय कक्ष के बाहर मौजूद सैन्य महिला अधिकारियों में खुशी की लहर दौड़ गयी। महिला अधिकारियों के साथ न्यायालय पहुंची एक अधिकारी ने कहा कि यह फैसला सैन्य बलों में नहीं बल्कि देश में महिलाओं के उत्थान में मददगार होगा। उन्होने कहा कि जो भी पद की पात्रता हासिल करे उसे कमान का अवसर प्रदान करना चाहिए। महिला अधिकारियों का प्रतिनिधित्व करने वाली अधिवक्ता मीनाक्षी लेखी ने कहा, ‘‘अनन्त संभावनाएं हैं।’’ उन्होने कहा कि शीर्ष अदालत का फैसला महिला अधिकारियों को अपने पुरूष सहगियों के बराबर अधिकार प्रदान करता है। लेखी ने कहा कि इस आदेश ने महिला अधिकारियों को काफी समय से लंबित अधिकार प्रदान किया है।

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न्यायालय का फैसला मोदी सरकार को करारा जवाब : प्रियंका
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने सेना की महिला अधिकारियों को तीन महीने के भीतर स्थायी कमीशन प्रदान करने के उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद सोमवार को दावा किया कि यह नारी शक्ति का विरोध करने वाली नरेंद्र मोदी सरकार को करारा जवाब है। प्रियंका ने ट्वीट कर कहा कि उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले ने देश की महिलाओं की उड़ान को नए पंख दिए हैं। महिलाएं सक्षम हैं - सेना में, शौर्य में और जल, थल, नभ में। पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर नारी शक्ति का विरोध करने वाली मोदी सरकार को यह करारा जवाब है।

प्रियंका ने भी दोहराई राहुल गांधी की गलती
हालांकि इस ट्वीट को करने की उतावली में प्रियंका भी वो ही गलती कर बैठी जो राहुल गांधी ने की थी। दरअसल जुलाई 2010 में उनकी ही सरकार इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। तब केंद्र की मनमोहन सरकार ने हाईकोर्ट के उस आदेश जिसमें सभी महिलाओं को सेवा के 14 साल पूरे होने पर पुरुषों की तरह स्थायी कमीशन देने के आदेश का यह कहकर विरोध किया था कि भारतीय सेना (Indian Army) में यूनिट पूरी तरह पुरुषों की है और पुरुष सैनिक महिला अधिकारियों को स्वीकार नहीं कर पाएंगे।

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