Thursday, Aug 18, 2022
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there is such a class in the country hat wants to be trapped in the web of illusion : bhagwat

देश-दुनिया में एक ऐसा वर्ग है जो भ्रमजाल में फंसे रहना चाहता है और उसको असत्य से भी परहेज नहीं:भागवत

  • Updated on 3/1/2022

नई दिल्ली। टीम डिजिटल। आरएसएस सरसंघ चालक मोहनराव भागवत ने कहा कि मेरे मन में भी शंका है कि क्या पुस्तक के प्रकाशित होने से सरस्वती थी या नहीं यह विवाद थमेगा, ऐसा मुझे नहीं लगता है। क्योंकि जिन्हें विवाद करना है, उन्हें करना ही है। उन्होंने कहा कि 1875 के बाद जब अंग्रेजों ने देखा कि इस देश को योग्य अवसर मिलते ही हमारे खिलाफ एकजुट होकर हमें बाहर करने के लिए लड़ते हैं और इसके बाद उन्होंने हमारी सामाजिक स्मृति को बर्बाद करने का काम किया। हमारे पर उन्होंने प्रयोग किया और हम उसमें फंसकर खुद को भूल गए। धूर्तों के प्रयोग सफल हुए, लेकिन अब दुनिया को बताने के साथ-साथ हमें अपने लोगों को बताना भी आवययक है। क्योंकि एक ऐसा वर्ग है जो भ्रमजाल में फंसना चाहता है और उसको असत्य से भी परहेज नहीं है। उसने अपने प्रमाण भी खड़े कर दिये हैं।

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यहां तक कि राजतरंगणि इतिहास का ग्रंथ नहीं बल्कि उनका मानना है कि वे लोग जो कहते हैं, वही प्रमाण हैं। फिर से एक बार उस सत्य को बताना आवश्यक है,क्योंकि उन्होंने हमारी भाषा, प्रमाण बदल दिये। हम गुलामी मानसिकता में थे, ऐसे में हम उनकी कसौटी पर खुद को खरा साबित करने के लिए जुट गए। लेकिन अब हम स्वतंत्र हो चुके हैं। इसलिए ऐसा बड़ा वर्ग समाज में है जो सामान्य से बड़े तक शामिल हैं। सरस्वती थी या नहीं यह उन्हें खोजने दो और वे सिद्ध करें, लेकिन हम तो रोजाना अपने पूजन में भी यमुना,गंगा, गोदावरी, सरस्वती का जिक्र करते हैं। सरस्वती दिखा भले ही नहीं सकते हैं, लेकिन सरस्वती है। यह संयोग ही है कि पिछले कुछ दिन से लगातार हो रहे कार्यक्रम में सरस्वती नदी का जिक्र है। 

पुस्तक लोकार्पण में रखे विचार
उन्होंने कहा कि जनता तो श्रद्धा से मान लेगी, लेकिन नई पीढ़ी को प्रमाण देना चाहिए और इसके लिए नए पाठ्यपुस्तकों में इस विषय को लेना चाहिए अन्यथा सभी बातों का प्रमाण देना पड़ता है। उन्होंने कहा कि सही प्रमाण हों तोअब राम के बारे में जो भी भ्रामक बातें थी, वे सब भी दूर हो गई और यह बात नई पीढ़ी भी मानने लगी कि राम अयोध्या में ही हुए थे। अपनी संस्कृति और गौरवपूर्ण इतिहास को दुनिया के सामने लाने के लिए खोजबीन व तथ्य के साथ रखना चाहिए। ताकि कोई यदि सरस्वती नदी जैसे मामले पर भी प्रश्न उठाए तो उसकी खुद की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा हो सके। हालांकि इसमें बहुत से लेागों को लगना पड़ता है। सरकार, प्रशासन के साथ-साथ समाज का भी इसमें महत्वपूर्ण रोल होता है।

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पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि पूरे विश्व में यह फैला हुआ कि किस तरह की समस्याओं से बचें, ऐसे समय में यह आयोजन हमें बहुत कुछ सोचने का अवसर प्रदान करता है कि विश्व में ऐसा क्यों हो रहा है ,क्या यह पहले भी हुआ है। इन सब बातों पर विचार करने की आवश्यकता महसूस हो रही थी। सरस्वती अभियान के साथ पहले कई तथ्य सामने नहीं थे जो अब सामने आ रहे हैं। वामपंथियों ने ऐसा स्थापित करने का भी प्रयास किया कि बाहर से ही आर्य आए। लेकिन वे इसे स्थापित नहीं कर सके। यहां तक कि सरस्वती को काल्पनिक बताने में भी लोग नहीं चूके। इस आयोजन का दूरगामी परिणाम अवश्य मिलेगा। 
आईजीएनसीए में सरस्वती नदी शोध पर आधारित पुस्तक द्विरूपासरस्वती का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर पुस्तक के संपादक डा.महेश शर्मा,  डा.स"िादानंद जोशी, आईजीएनसीए प्रमुख रामबहादुर राय आदि गणमान्य शामिल रहे। 


 

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