अमृता प्रीतम ने रखी थी लिव -इन की नींव, पढ़ें

  • Updated on 8/31/2016
  • Author : Priyanka tiwari

Navodayatimesनई दिल्ली (टीम डिजिटल): अमृता आजाद ख्याल लड़कियों के लिए रोल मॉडल थीं। हालाँकि आजादी का मतलब उनके लिए भावनात्मक आजादी और फिर सामाजिक आजादी थी। अमृता का जन्म 31 अगस्त, 1919 को हुआ था। अमृता एक कवयित्री थी और उनकी कवितायें भावना, प्रेम  और संवेदनाओं से भरी होती थीं। आज भी समाज में लिव -इन स्वीकार्य नहीं है लेकिन उस ज़माने में अमृता लिव-इन में रहीं, लेकिन उस रिश्तें में भी सम्मान और समर्पण था।

अमृता कि सगाई 6 बरस की उम्र में हो गई थी और 11 बरस कि कम उम्र में मां उन्हें छोड़ गईं। 16 साल कि उम्र में उन्होंने अपनी पहली किताब पूरी कि और 16 साल कि उम्र में ही उनकी शादी प्रीतम सिंह से हो गई। अमृता बेहद भावुक थीं, लेकिन उतनी ही खूबसूरती के साथ उन्हें अपनी भावनाओं और रिश्तों के बीच सामंजस्य बिठाना आता था। आजीवन उन्होंने साहिर से प्रेम किया, दो बच्चे कि मां बनी। साहिर कि मुहब्बत दिल में होने के कारण शादी- शुदा जीवन से बाहर निकलने का फैसला लिया और फिर साहिर ने भी उन्हें छोड़ दिया, लेकिन फिर भी वह सम्मान के साथ  उस रिश्ते से अलग हो गईं।जीवन के आखिरी समय में सच्चा प्यार उन्हें इमरोज के रूप में मिला। उनकी जीवन के उतर- चढाव को उनकी आत्मकथा के रूप में लिखा गया, खुशवंत सिंह के सुझाव पर उनके जीवनी को रशीदी टिकट नाम दिया गया।

अमृता और साहिर 

अमृता को साहिर लुधियानवी से बेपनाह मोहब्बत थी। साहिर लाहौर में उनके घर आया करते थे। साहिर को सिगरेट पीने कि आदत थी, वह एक के बाद एक लगातार सिगरेट पिया करते थे। उनके जाने के बाद सिगरेट की बटों को साहिर के होंठों के निशान को महसूस करने के लिए उसे दोबारा पिया करती थीं। इस तरह अमृता को सिगरेट पीने कि लत साहिर से लगी, जो अजीवन बरक़रार रहा। अमृता साहिर को ताउम्र नहीं भुला पाईं। साहिर भी उन्हें मोहब्बत करते थे और दोनों एक दूसरे को ख़त लिखा करते थे। साहिर बाद में लाहौर से मुंबई चले आये, जिसके बाद भी दोनों का प्रेम बरकार रहा। हालांकि कहा जाता है कि अमृता से दूर रहने के कारण साहिर के जीवन में गायिका सुधा मल्‍होत्रा आ गई थीं। हालांकि दोनों के दिल से एक दूसरे के लिए प्यार ख़त्म नहीं हुआ था। कहा जाता है कि अमृता ने साहिर की पी हुई सिगरेटों के टुकड़े संभाल कर रखे थे तो वहीं साहिर ने अमृता के कि पी हुई चाय कि प्याली संभाल कर रखी थी। कहा जाता है कि साहिर ने बरसों तक अमृता का पिया हुआ चाय के प्‍याले को धोया तक नहीं था। हालांकि बाद मेंदोनों अलग हो गए। कहा जाता है कि अमृता जितना समर्पण साहिर के प्यार में नहीं था।कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि उनका प्यार एकतरफा था। 

अमृता और इमरोज 

इमरोज़ अमृता के जीवन में काफी देर से आये। अमृता कभी कभी इस बात कि शिकायत भी थी इमरोज से कभ कभी वह पूछती,  ‘अजनबी तुम मुझे जिंदगी की शाम में क्यों मिले, मिलना था तो दोपहर में मिलते’। दोनों ने साथ रहने के फैसला किया और दोनों पहले दिन से ही एक ही छत के नीचे अलग-अलग कमरों में रहे। जब इमरोज ने कहा कि वह अमृता के साथ रहना चाहते हैं तो उन्होंने कहा पूरी दुनिया घूम आओ फिर भी तुम्हें लगे कि साथ रहना है तो मैं यहीं तुम्हारा इंतजार करती मिलूंगी। कहा जाता है कि तब कमरे में सात चक्कर लगाने के बाद इमरोज ने कहा कि घूम लिया दुनिया मुझे अभी भी तुम्हारे ही साथ रहना है। 

अमृता रात के समय शांति में  लिखती थीं, तब धीरे से इमरोज चाय रख जाते। यह क्रम लगातार चालीस पचास बरसों तक चला। इमरोज़ जब भी उन्हें स्कूटर पर ले जाते थे और अमृता की उंगलियाँ हमेशा उनकी पीठ पर कुछ न कुछ लिखती रहती थीं...और यह बात इमरोज भी जानते थे कि लिखा हुआ शब्द साहिर ही है। जब उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया तो इमरोज़ हर दिन उनके साथ संसद भवन जाते थे और बाहर बैठकर उनका घंटों इंतज़ार करते थे। अक्सर वह लोग समझते थे कि इमरोज उनके ड्राइवर हैं। यही नहीं इमरोज ने अमृता के खातिर अपने करियर के साथ भी समझौता किया उन्हें कई ऑफर मिले, लेकिन उन्होंने अमृता के साथ रहने के लिए ठुकरा दिया। गुरुदत्त ने इमरोज को मनमाफिक शर्तों पर काम करने का ऑफर दिया लेकिन अमृता को लगा कि वह भी साहिर कि तरह छोड़ ना जाएँ इसलिए उन्होंने ना जाने का फैसला लिया। 

आखिरी समय में फिर जाने के कारण उन्हें चलने फिरने में तकलीफ होती थी तब उन्हें नहलाना, खिलाना, घुमाना जैसे तमाम रोजमर्रा के कार्य इमरोज किया करते थे। 31 अक्तूबर 2005 को अमृता ने आख़िरी सांस ली, लेकिन इमरोज़ का कहना था कि अमृता उन्हें छोड़कर नहीं जा सकती वह अब भी उनके साथ हैं। इमरोज ने लिखा था -  

'उसने जिस्म छोड़ा है, साथ नहीं।  वो अब भी मिलती है, कभी तारों की छांव में, कभी बादलों की छांव में, कभी किरणों की रोशनी में कभी ख़्यालों के उजाले में हम उसी तरह मिलकर चलते हैं चुपचाप, हमें चलते हुए देखकर फूल हमें बुला लेते हैं, हम फूलों के घेरे में बैठकर एक-दूसरे को अपना अपना कलाम सुनाते हैं उसने जिस्म छोड़ है साथ नहीं...'

सम्मान 

कुल मिलकर उन्होंने लगभग 100 पुस्तकें लिखीं। उन्‍हें पद्मविभूषण, साहित्य अकादमी पुरस्‍कार और ज्ञानपीठ  पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया था। वे साहित्य अकादमी पुरस्‍कार पाने वाली पहली महिला थीं।

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