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इतिहास का बड़ा खुलासा- भारत के मूल निवासी थे हड़प्पा सभ्यता के लोग

  • Updated on 9/7/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। ऐतिहासिक दस्तावेजों में अभी तक हम पढ़ते आएं है कि आर्य भारत के मूल निवासी नहीं थे, बल्कि द्रविड़ भारत के मूल निवासी थे। लेकिन अब यह अवधारणा बदल गई है। इस अवधारणा के बदलने के पीछे वो डीएनए टेस्ट है जो पुणे के दक्कन कॉलेज ऑफ आर्कियोलॉजी के प्रोफेसर वसंत शिंदे की अगुवाई में साल 2015 में राखीगढ़ी के टीलों की खुदाई के दौरान मिले नर कंकाल के डीएनए टेस्ट से साबित हुआ है। यहां से प्राप्त कंकाल तकरीबन साढ़े चार हजार साल पुराने हैं, जिनका डीएनए सैंपल बीरबल इंस्टीट्यूट ऑफ पेलिओबॉटनी में भेजा गया था। जिसके बाद यह साबित हो गया है कि हड़प्पा सभ्यता के विकास के पीछे भारतीय उपमहाद्वीप के लोग ही थे। 

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प्रो. वसंत शिंदे व डॉ. नीरज राय ने रिपोर्ट पेश की

प्रो. वसंत शिंदे व डॉ. नीरज राय ने शुक्रवार को एक प्रेसवार्ता के दौरान वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित अपनी तथ्यात्मक रिपोर्ट पेश की। प्रो. वसंत शिंदे ने बताया कि हड़प्पा सभ्यता एक व्यापारिक केंद्र था, यहां के ही लोग ईरान व मध्य एशिया में व्यापार व खेती के कार्यों में संलग्न थे, जिससे यह साबित होता है कि कृषि की तकनीक भी यहीं से शुरू की गई थी। हालांकि भाषा की उत्पत्ति के बारे में उन्होंने कुछ भी जानकारी ना होने की बात कही। आर्यन शब्द का भी प्रो. शिंदे ने विरोध किया। उनका कहना था कि भारतीय उपमहाद्वीप के लोग कई देशों जैसे तुर्कमेनिस्तान और ईरान जाकर बसे, उनके कंकाल का मिलान भारत के लोगों से हुआ और इस बात को बल मिला कि आर्य बाहर से आए थे। उन्होंने बताया कि यहां शवाधानों के पास बहुमूल्य मनके, शंख की चूडिय़ां व कानों की बालियों सहित मृदुभाण्ड भी प्राप्त हुए हैं जोकि एक उन्नत सभ्यता की ओर इशारा करते हैं। यहां प्राप्त हुए कंकालों की लंबाई की काफी अधिक है जैसा कि हरियाणा व राजस्थान के लोगों की देखने को मिलती है।

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भारत में किसी प्रकार का कोई आर्यन हमले जैसी घटना नहीं हुई

इस अध्ययन के अनुसार यह भी दावा किया गया है भारत में किसी प्रकार का कोई आर्यन हमले जैसी घटना नहीं हुई थी और ना ही देश में विकास का कार्य पश्चिम के लोगों द्वारा किया गया है। जेनेटिक स्टडी के अनुसार साउथ एशिया के देशों के लोगों का डीएनए, हडप्पन डीएनए है और 12 हजार सालों से अब तक उनके डीएनए में कोई बदलाव नहीं आया है जोकि भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोगों से मिलता है। 

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पहली बार खुदाई में युगल की कब्र मिली

प्रो. शिंदे को खुदाई वक्त यहां से युगल कंकाल प्राप्त हुआ है, जिसमें युवक कंकाल का मुंह युवती कंकाल की ओर है। पहली बार खुदाई में युगल की कब्र मिली है। पुरातत्वविदों के अनुसार, युगल कंकाल का मुंह, हाथ और पैर सभी एक समान है। इससे साफ है कि दोनों को जवानी में एक साथ दफनाया गया था। बता दें के ये निष्कर्ष हाल ही में अंतरराष्ट्रीय पत्रिका, एसीबी जर्नल ऑफ अनैटमी और सेल बायॉलजी में प्रकाशित किए गए थे। इससे पूर्व लोथल में एक युगल कब्र खोजी गई थी जिसमें महिला विधवा थी और उसे अपने पति की मौत के बाद दफनाया गया था।

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हडप्पा सभ्यता के लोग सरस्वती की पूजा किया करते थे

राखी गढ़ी में मिले वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर एक रिपोर्ट यह भी सामने आई है कि हडप्पा सभ्यता के लोग सरस्वती की पूजा किया करते थे। टीलों पर खुदाई के दौरान उन्हें कई शवाधान मिले हैं व कई हवनकुंड के अवशेष व उसमें हवन किए जाने के सबूत भी प्राप्त हुए हैं। जिससे यह भी साबित होता है कि वो लोग वैदिक सभ्यता से ताल्लुक रखते थे जिसका जिक्र ऋग्वेद में होता है। इसलिए प्रो. शिंदे हडप्पा व वैदिक लोगों को एक ही मान रहे है

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