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the-beginning-of-the-struggle-for-5g

अब ‘5-जी’ के लिए संघर्ष की शुरूआत, जानें कुछ खास बातें

  • Updated on 12/6/2017

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। 20 वर्षों दौरान उपभोक्ता इंटरनैट क्रांति से हमारे जीवन में अनेक आश्चर्यजनक चीजें आ गई हैं जैसे कि ऑनलाइन सर्च इंजनों से लेकर निजी सहायक की भूमिका अदा करने वाले सैलफोनों तक। लेकिन ये बदलाव चाहे कितने भी नाटकीय क्यों न हों, ये निकट भविष्य में आने वाले 5-जी वायरलैस तथा ‘इंटरनैट ऑफ थिंग्ज’ (आई.ओ.टी.) की तुलना में कुछ भी नहीं। यह टैक्नोलॉजी हमारे फ्रिज से लेकर कार और बाइक से लेकर कम्प्यूटर, टी.वी. से लेकर वाशिंग मशीन इत्यादि तक हर चीज को ‘डाटा माइनिंग चिप्स’ में संलिप्त कर लेगी।

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इससे न केवल पूर्णत: नई तरह की कारोबारी इकाइयों का सृजन होगा बल्कि विज्ञापनदाता और विज्ञापन एजैंसियां अनेक नए-नए तरीकों से बिल्कुल लक्षित विज्ञापन अभियान चला सकेंगी क्योंकि उन्हें केवल इतना ही पता नहीं होगा कि हम इस समय कहां हैं बल्कि उन्हें यह भी विदित होगा कि हमारे घर में दूध खत्म हो गया है, बगीची को पानी लगाने की जरूरत है या घर में मेहमान आए हैं इत्यादि। इसमें आॢथक जोखिम के साथ कमाई भी बहुत अधिक होगी। बड़ी-बड़ी कम्पनियां हालांकि बहुत अमीर हैं लेकिन 5-जी से लैस नए विश्व में उनकी सम्पत्ति लंबी छलांगे लगाकर बढ़ती जाएगी। 

फिर भी जिस टैक्नोलॉजी के बूते यह सब कुछ संभव होगा उसको अभी से हथियाने के लिए कारोबारों और उद्योगों के बीच गला-काट प्रतिस्पर्धा जारी है। हर कोई इस रस भरे फल को छीनने को उतावला है। परम्परागत रूप में वायरलैस उपकरण बनाने वाली एप्पल, गूगल, सैमसंग तथा अन्य कम्पनियां अति महत्वपूर्ण वायरलैस टैक्नोलॉजी विकसित करने वाली नोकिया, क्वालकॉम तथा एरिक्सन जैसी कम्पनियों को चिप्स तथा अन्य पेटैंटिड बौद्धिक सम्पदा प्रयुक्त करने की एवज में भारी लाइसैंस फीस अदा करती हैं।

अमरीका और यूरोप के मानक तय करने वाली संस्थाओं ने इस 5-जी सूचना तंत्र के निर्माण हेतु जरूरी टैक्नोलॉजी को चिन्हित किया है और उसके बाद ही आविष्कारकों को उन्हें पेटैंट कराने की अनुमति दी है, वह भी इस शर्त पर कि वे बिना किसी भेदभाव के निष्पक्ष एवं न्यायपूर्ण ढंग से बाजार के सभी खिलाडिय़ों को इन तकनीकों तक पहुंच उपलब्ध करवाएंगे।

वैसे ‘निष्पक्ष’ की परिभाषा को लेकर बहुत बड़े मतभेद हैं। जितने भिन्न-भिन्न तरह के उपकरणों तक इस कनैक्टीविटी का दायरा फैलता जा रहा है, मतभेद भी उतने ही व्यापक होते जा रहे हैं। सबसे विवादित मुद्दों में से एक यह है कि अति महत्वपूर्ण पेटैंटिड टैक्नोलॉजीज का मूल्य क्या चिप की कीमत पर आधारित होना चाहिए या उस फोन की कीमत पर जो इन्हें शक्ति प्रदान करता है। पहले मामले में ऐसी टैक्नोलॉजी का मूल्य केवल कुछ डालर ही बनेगा जबकि दूसरी स्थिति में कई सौ डालर तक पहुंच सकता है। दिग्गज टैक कम्पनियां स्वाभाविक तौर पर चिप के आधार पर लाइसैंस हासिल करना अधिक लाभदायक मानती हैं क्योंकि इस तरह उन्हें आई.पी. यानी बौद्धिक सम्पदा के लिए कम राशि अदा करनी पड़ेगी।

क्वालकॉम जैसी कम्पनियां चाहती हैं कि अंतिम तैयार उत्पाद यानी सैल फोन या कार के आधार पर पेटैंट टैक्नोलॉजी का मूल्य तय किया जाए। एप्पल सहित सबसे बड़े कम्प्यूटर ब्रांडों के बीच मतभेदों की गहराती खाई के पीछे वास्तव में ऐसे ही कारण कार्यरत हैं। ये कम्पनियां हजारों पेटैंटिड टैक्नोलॉजी पर आधारित छोटे-छोटे कलपुर्जों को जोड़कर एक बहुत ही शानदार अंतिम उत्पाद तैयार करने की क्षमता रखती हैं जोकि उनकी कमाई में सबसे अधिक योगदान करेगा।

 इसीलिए वे चिप के आधार पर मूल्य निर्धारण की बजाय अंतिम उत्पाद की कीमत को आधार बनाना चाहती हैं। दूसरी ओर अमरीका और यूरोप के आविष्कारक ये दलील देते हैं कि उन्होंने अनुसंधान और विकास तथा मानव एवं नई तकनीकों का सृजन करने पर अरबों-खरबों डालर निवेश किए हैं, तभी जाकर स्मार्टफोन अस्तित्व में आए हैं लेकिन अब इन कम्पनियों को गच्चा देने की कोशिश की जा रही है।

एप्पल और क्वालकॉम के बीच जिस तरह लंबे समय तक कानूनी लड़ाई चली वह इसी विवाद को प्रतिबिंबित करती है। क्वालकॉम ने कुछ चिप टैसटिंग सॉफ्टवेयर एप्पल को उपलब्ध करवाने से इन्कार कर दिया जबकि एप्पल ने क्वालकॉम को उसके देय शुल्क अदा करने से इन्कार कर दिया। 

सान फ्रांसिस्को आधारित इन्वैस्टमैंट बैंक हौलीहान लॉकी के प्रबंध निदेशक एवं बौद्धिक सम्पदा विशेषज्ञ एल्विर कौसेविच का कहना है, ‘‘इतनी अधिक मुकद्दमेबाजी की वास्तविकता का तात्पर्य यही है कि अमरीका और यूरोपीय यूनियन दोनों ही के नियामक अपना काम मुस्तैदी से नहीं कर रहे।’’ वास्तव में अंधमहासागर के दोनों छोरों से मिल रहे नियामक संदेश परस्पर विरोधी हैं।

2015 में अमरीका के मानक तय करने वाले निकाय आई.ई.ई.ई. ने जो पोजीशन ली थी वह दिग्गज टैक कम्पनियों के पक्ष में थी लेकिन 10 नवम्बर को अमरीका के सहायक महाधिवक्ता माकन दिलरहीम ने अपने भाषण में संकेत दिया कि जो कम्पनियां टैक्नोलॉजी अदायगी ‘रोककर’ रखती हैं या लाइसैंस फीस अदा करने से इन्कार करती हैं (जैसे कि एप्पल) वे उन कम्पनियों की तुलना में बहुत बड़ी समस्या हैं जो पेटैंटों की मालिक हैं और अधिक ऊंची फीस न मिलने पर टैक्नोलॉजी रोक लेती हैं।

इसी बीच यूरोपीय आयोग बिल्कुल विपरीत दिशा में अग्रसर है। आप शायद यह सोच रहे हों कि इस बात के लिए किसी खास बुद्धिमता की जरूरत नहीं कि यूरोप को अपनी टैलीकॉम कम्पनियों के हितों की रक्षा करनी चाहिए। फिर भी यूरोपीय आयोग के अंदर एक युद्ध चल रहा है जिसमें अनुसंधान पर भारी निवेश करने वाली नोकिया जैसी कम्पनियां दूरसंचार कारोबारों के पक्ष में दलील दे रही हैं जबकि एकाधिकारवाद के विरोधी यह दलील दे रहे हैं कि पेटैंटों को संरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि इससे एकाधिकारवाद को बढ़ावा मिलता है।

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यह भी संभव है कि एकाधिकारवाद के विरोधी बिल्कुल ही अलग दावेदारों के समूह का बचाव करते दिखाई देते हैं। यदि कारें ‘पहियाधारी फोन’ का रूप ग्रहण कर लेती हैं तो फ्रांस, जर्मनी तथा इटली के आटो निर्माताओं को सस्ती वायरलैस टैक्नोलॉजी की जरूरत पड़ेगी, बिल्कुल एप्पल और गूगल की तरह। हो सकता है कि यूरोपीय कार निर्माताओं की ‘स्मार्ट कार’ परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए  यूरोपीय आयोग पेटैंट धारक दूरसंचार कम्पनियों को बलि का बकरा बनाए। 
यह भी हो सकता है कि वे हवा का रुख देखें और इस बात का इंतजार करें कि अमरीकी ऊंट किस करवट बैठता है- न केवल वायरलैस मानकों के मामले में बल्कि मोटे रूप में पेटैंट अधिकारों के मामले में।

चालू सप्ताह में अमरीकी पेटैंट कार्यालय हेतु राष्ट्रपति द्वारा नामित निदेशक की पुष्टि करने के लिए सुनवाई आयोजित होगी और सुप्रीमकोर्ट अमरीका के तेल उत्पादक राज्यों (ऑयल स्टेट्स) की इस याचिका पर सुनवाई करेगी कि अमरीका में समूची पेटैंट प्रणाली को बदला जाए। दुनिया भर के कार्पोरेट वकीलों की इस बात को लेकर बांछें खिली हुई हैं। यह तो 5-जी के लिए चल रहे युद्धों की शुरूआत मात्र है, आगे-आगे देखिए होता है क्या! (साभार ‘फाइनैंशियल टाइम्स’)

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