Sunday, May 22, 2022
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दक्षिण भारत में मतांतरण का हिंसक षड्यंत्र, जिम्मेदार कौन?

  • Updated on 2/23/2022

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। “मैं लावण्या हूं, कक्षा 8वीं से लेकर 12 वीं तक अपने स्कूल की टॉपर थी, वो मुझे सुबह जल्दी उठकर गेट खोलने को कहती, रोज एक घंटा साथ बिठाती, छात्रावास के अकाउंट्स का काम करवाती। मैं सही करती फिर भी उसको गलत बता दोबारा करने बोलती। इस कारण से मेरा पढ़ाई से ध्यान हट रहा था। मार्क्स कम आते जा रहे थे। पोंगल आदि त्योहारों में घर जाने नहीं दिया जा रहा था। वार्डन का कहना था कि यही रह कर पढ़ाई करो, इन सब बातों  की कारण तुम खुद हो, मेरा दोष सिर्फ इतना है कि मैंने ईसाई धर्म में मत परिवर्तन से इंकार कर दिया। दो वर्षों से प्रताड़ना झेलने के बाद आज थककर मैंने जहर पी लिया है।”
यह मार्मिक शब्द हैं 17 वर्ष की बच्ची लावण्या के, जो आज हमारे बीच तो नहीं है लेकिन उसके ये शब्द समाज की उस वास्तविकता को दर्शाते हैं। जिसमें न जाने कितनी लावण्या मतांतरण की बलि चढ़ जा रही हैं। हाल फिलहाल में तमिलनाडु के तंजावुर जिले में मिशनरियों द्वारा मतांतरण का प्रयास करने की घटना सामने आई है। जिसमें   लावण्या नाम की बालिका को मिशनरी विद्यालय द्वारा इस हद तक मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया कि उसने अपने जीवन का अंत कर लिया। दिलचस्प बात यह है कि लावण्या के पिता तमिलनाडु की तत्कालीन सत्ताधारी डीएमके पार्टी में बीते 25 वर्षों से सक्रिय सदस्य रहे हैं और आज डीएमके की स्टालिन सरकार ने उनकी पुत्री को मानसिक रूप से अस्वस्थ तक घोषित कर दिया।

इस संबंध में मद्रास उच्च न्यायालय ने सरकार को सीबीआई जांच के लिए स्वीकृति दे दी। हैरानी की बात यह है कि स्टालिन सरकार एक तो सीबीआई के साथ सहयोग करने को तैयार नहीं है वहीं दूसरी तरफ छात्रावास की वार्डन सगाया मेरी, जिसकी प्रताड़ना के कारण 17 वर्षीय बच्ची लावण्या ने जीवन का अंत कर लिया। जहर खाने के बाद जब उसकी हालत गंभीर हुई तब अस्पताल में 10 दिनों तक जिंदगी से जूझती रही, उस दौरान उसको लगा कि अब सच कहना चाहिए और उसने पूरी बात वीडियो के जरिए सबके सामने रखा। जिसमेें उसने मतांतरण न करने की सजा को विस्तारपूर्वक वर्णित किया। हम सभी ने भारत में धर्मांतरण और उससे जुड़ी तुष्टिकरण की घटनाएं देखी और सुनी हैं, यह पूरा मामला भी ईसाई तुष्टिकरण का है।

ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में अंग्रेजों का भारत आना और उनके साथ ईसाई धर्म का प्रचार दोनों लगभग साथ की घटनाएं हैं। शुरू में मिशनरियों का सामाजिक हस्तक्षेप, उनका सेवा भावना को दिखाता था लेकिन समय के साथ उनका वास्तविक रूप भी सभी के सामने है। स्वतंत्रता के पूर्व भारत में गरीबी और बेरोजगारी शीर्ष पर थी। जीवनयापन के लिए मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना असंभव सा हो रहा था। ऐसी दशा में इन मिशनरियों द्वारा बढ़ाया हाथ किसी गरीब के लिए ईश्वर का वरदान सिद्ध हो जाता। इनके द्वारा लुभावने वायदे और सौगातों की आड़ में व्यक्ति अपनी परंपरा, सभ्यता और संस्कृति से मुंह मोड़ लेता। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह सिर्फ धन और सुविधाओं के लोभ तक सीमित नहीं रहा अपितु इसका चेहरा और भी विकराल हुआ है। भारतीय आधुनिक और समकालीन इतिहास ऐसी सैकड़ों घटनाओं से भरा है जिसमें मिशनरियों द्वारा मानसिक तौर पर प्रताड़ित कर सनातन धर्म पर कुठाराघात किया गया है। आंकड़ों के आईने में देखें तो स्थिति स्पष्ट है कि किस प्रकार से दक्षिण भारत और उत्तर पूर्वी प्रदेशों में ईसाई धर्म का प्रभाव बढ़ा है। इसके क्या कारण हैं? जाहिर है उत्तर में आप मिशनरियों का नाम लेंगे!

 इतिहास साक्षी है कि मिशनरियों ने अपने प्रभाव को बढ़ाने हेतु द्रविड़ आंदोलन को सह दी, दक्षिण भारत को भारत राज्य से पृथक करने की उनकी साजिश सफल तो नहीं हुई लेकिन इसका प्रयास आज भी जारी है, इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं होना चाहिए। देश के प्रत्येक कोने में ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित विद्यालय और चिकित्सालय मौजूद हैं। लेकिन यह चर्चा का बिंदु है कि क्या उनका उद्देश्य मात्र सेवा भावना है? सभी अभिभावकों की इच्छा होती है कि उनकी संतान शहर के महंगे मिशनरी स्कूल में पढ़े और अंग्रेज़ी बोले लेकिन हमने विद्या के मंदिर की शक्ल में मतांतरण का काला कारोबार करने वाली इन संस्थाओं की वास्तविकता जाननी चाहिए। जिसमेें उसने मतांतरण न करने की सजा को विस्तारपूर्वक वर्णित किया। वर्तमान भारत ने हम कल्पना नहीं कर सकते कि आज भी मतांतरण को लेकर लगातार दो वर्षों तक मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा सकता है। तमिलनाडु सरकार का शर्मनाक चेहरा तो तब सामने आया जब सरकार द्वारा किसी प्रकार का मुआवजा या सहानभूति सामने नहीं आई।

इसको लेकर छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद देशभर में आंदोलन और विरोध के माध्यम से तमिलनाडु सरकार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रही है। यहां तक कि अभाविप की राष्ट्रीय महामंत्री निधि त्रिपाठी के साथ 32 कार्यकर्ताओं को स्टालिन सरकार ने दर्जनों धाराएं लगाकर 14 दिन की रिमांड पर भेज दिया। देश में युवाओं की बड़ी संख्या सड़कों पर निकली लेकिन न लावण्या को ही न्याय मिल रहा और जो उसके लिए न्याय की मांग कर रहे उनके साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया गया। परंतु सत्यमेव जयते, सत्य की इस बार भी विजय हुई और कानूनी प्रक्रिया द्वारा निधि त्रिपाठी के साथ बाकी 32 कार्यकर्ता रिहा हुए। हालांकि इससे अभाविप की लड़ाई समाप्त नहीं हो जाती है। इस विजय से उनका उत्साह बढ़ा है और वह एक बड़ी लड़ाई के लिए तैयार हैं जो लावण्या को न्याय दिलाने के साथ ही थमेगी।

आज जब हम वसुधैव कुटुंबकम् वाली संस्कृति का उदाहरण देते हैं उस भारत में जबरदस्ती मतांतरण कराने का हिंसक षड्यंत्र जारी है। प्रश्न यह है कि इस तरह की घटनाओं में सरकार की स्पष्ट भूमिका है। बिना सरकार के सहयोग के इतनी बड़ी संख्या में मतांतरण संभव नहीं हो सकता। क्योंकि दक्षिण भारत में मिशनरियों की संख्या में बढ़ोतरी का आंकड़ा अपनी कहानी स्वयं बता रहा है। दूसरी तरफ लावण्या मामले में जिस वार्डन सराया मैरी को दोषी ठहराया जा रहा उसकी रिहाई के बाद डीएमके सरकार ने उसका सम्मान किया। इस घटना से सरकार की भूमिका पर प्रश्न तो निश्चित ही खड़े होंगे। इससे यह भी साफ़ है कि सरकार पर इन मिशनरियों का किस हद तक दवाब है। जिसके कारण सरकार इतने विरोध के बाद भी वह कॉन्वेंट स्कूल और मिशनरियों के खिलाफ़ एक शब्द नहीं बोलते हैं। यहां तक इस मामले पर पर्दा डालने के लिए तमिलनाडु सरकार का पूरा तंत्र सक्रियता से लगा हुआ है। 

शांभवी शुक्ला (शोधार्थी, जवारलाल नेहरू विश्वविद्यालय)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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