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Discussion on Jagannath Rath Yatra continues can 280 years tradition break PRSHNT

जगन्नाथ रथयात्रा पर चर्चा जारी, क्या लॉकडाउन के कारण टूट सकती है 280 साल की परंपरा

  • Updated on 4/30/2020

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। देश में कोरोना वायरस (Coronavirus) के कारण सभी आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक कामों पर रोक लगा हुआ है। चार धाम यात्रा पर रोक के बाद अब रथ यात्रा पर भी रोक लग सकती है। करीब 280 साल में यह पहला मौका होगा जब भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा रोकी जा सकती है, अभी इस पर कोई स्थिति साफ नहीं की गई है कि इस बार रथ यात्रा रोक दी जाएगी या बिना भक्तों के ही से निकाला जाएगा इस पर अंतिम निर्णय 30 मई को लाभ डाउन के दूसरे फिर की समाप्ति के बाद लिया जा सकता है।

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निरस्त हो सकती है यात्रा
बता दें कि 23 जून को भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकलना है और इसकी तैयारियां अक्षय तृतीया यानी 26 अप्रैल से ही शुरू कर दी गई है। यात्रा के लिए मंदिर के अधिकारियों और पुरोहितों ने गोवर्धन मठ के शंकराचार्य जगत गुरु श्री निशु आनंद सरस्वती के साथ भी रथ यात्रा को लेकर बैठक की है।

लेकिन उसके बाद भी अभी कोई निर्णय साफ नहीं हुआ है, वही नेशनल लॉक डाउन की वजह से पिछले 1 महीने से मंदिर पुरी मंदिर बंद है। सारी परंपराएं और विधियां चुनिंदा पूजा पंडितों के द्वारा ही कराई जा रही है बताया जा रहा है कि लॉक डाउन आगे बढ़ाया जाता है तो यात्रा निरस्त करने का ही विकल्प होगा। जिसे लेकर भी मंदिर के सदस्य तैयार हैं, सदस्यों का कहना है कि भगवान भी चाहते हैं कि उनके भक्त सुरक्षित रहें ऐसे में यात्रा निरस्त करने में कोई दिक्कत नहीं है।

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2 किलोमीटर तक यात्रा करते हैं भगवान जगन्नाथ
दरअसल मंदिर के रिकॉर्ड में 2504 साल पहले आक्रमणकारियों के कारण पूरे 144 सालों तक पूजा और विभिन्न परंपराएं इस मंदिर में बंद रही थी। इसके बाद शंकराचार्य ने फिर से इस मंदिर में परंपराओं को शुरू कर दिया था और इस मंदिर को नया स्वरूप 12 वीं शताब्दी में दी गई। तब से अब तक लगातार यह परंपरा चली आ रही है।

भगवान जगन्नाथ की यह रथयात्रा आषाढ़ से आरंभ होती है और यात्रा मुख्य मंदिर से शुरू होकर 2 किलोमीटर दूर स्थित गुड़ीचा मंदिर पर समाप्त होती है जहां भगवान जगन्नाथ 7 दिन तक विश्राम करते हैं और आषाढ़ शुक्ल दशमी के दिन फिर से वापसी यात्रा होती है जो मुख्य मंदिर पहुंचती है यह बहुदा यात्रा कहलाती है इसे बहुदा यात्रा कहा जाता है।

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ऐसे बनता है रथ
भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा बनाने के लिए नारियल की लकड़ी से बलभद्र और सुभद्रा बनाए जाते हैं उनके रक्त का रंग लाल और पीला होता है। इनके इस रथ का कई अलग-अलग नाम है गरुड़ध्वज, कपिध्वज, नंदीघोष इसके अलावा रथ के घोड़ों का नाम शंख ग्राहक श्वेत है जिनका रंग सफेद रखा जाता है वही सारथी का नाम दारुक है। 16 पहियों से बनाया जाता है इसके साथ ही इसकी ऊंचाई साडे 13 मीटर होती है।

 

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