Tuesday, Jan 25, 2022
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Indian National Congress party Randeep Surjewala on pm narendra modi on farmers aljwnt

मोदी सरकार को मिलेगा 'किसान विरोधी तगमा'

  • Updated on 5/25/2020

भारत का भाग्यविधाता अन्नदाता किसान अपना खून पसीना सींच कर खेतों में सोना उगाता है मगर उस सोने को मिट्टी के दाम बेचने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। भारत में आज भयावह महामारी की भीषणतम मार अगर किसी पर पड़ी है तो वो है ‘राष्ट्र निर्माता मजदूर’ और ‘अन्नदाता किसान’। एक अपने घर जाने के लिए और दूसरा अपनी फसलों के दाम पाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है।

केंद्र का किसानों के लिए कानूनों में बदलाव का प्रस्ताव 
केंद्र सरकार कहती है कि ये कानूनी बदलाव किसानों की किस्मत बदल देंगे मगर सच इसके बिल्कुल विपरीत है। आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955, एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्कीट कमेटी (ए.पी.एम.सी.) एक्ट में बदलाव के लिए मोदी सरकार जल्द अध्यादेश लाने की तैयारी में है, जिसमें कहा गया है कि :  

पहला : इस कानून के बदलाव के अमल में आने के बाद कोई भी किसान इस बात के लिए स्वतंत्र होगा कि वह अपनी फसल मंडियों के बाहर भी बेच सकेगा, अर्थात किसान अब अपनी उपज को किसी दूसरे राज्य में भी बेच सकेगा। अभी तक किसान अपनी फसल राज्यों की मंडियों में लाइसैंंसधारी आढ़तियों को ही बेच सकते हैं। क्या इस बदलाव से किसानोंकी आमदनी पर व्यापक अंतर आएगा? जवाब नहीं में है।

आज देश में 14.64 करोड़ किसान हैं, जिनमें से 12.58 छोटे किसान हैं जिनकी औसत जोत 0.89 हैक्टेयर या 2.19 एकड़ है। तब यह दिवास्वप्न ही होगा कि छोटा किसान अपनी उपज को दूसरे राज्यों में बेच सके। वो तो कोशिश करता है कि खेत के नजदीक से नजदीक जगह पर अपनी फसल बेच जाए, ताकि उसकी ट्रांसपोर्टेशन लागत कम से कम आए। इस छोटे किसान को अधिकतर समय मौजूदा बैंकिंग प्रणाली से दिन-प्रतिदिन की जरूरतों के लिए कर्ज भी उपलब्ध नहीं है। तो ऐसे में छोटे किसान के लिए नजदीक की मंडी में आढ़ती के माध्यम से फसलबेचना ही सबसे वाजिब उपाय है, न कि दूसरे प्रांतों और विदेशों में निर्यात कर फसल बेचने का सब्जबाग, जो अव्यावहारिक भी है और गैर-प्रासंगिक भी।   

दूसरा : हाल ही में मोदी सरकार द्वारा किसानों के हित में यह बदलाव बताया जा रहा है कि वह आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन कर उपजे हुए अनाज से लेकर तिलहन की अधिकतम मात्रा रखने के संबंध में जारी प्रतिबंध (स्टॉक सीमा) को खत्म कर देंगे, अर्थात आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में बदलाव करके प्राइवेट हाथों में खाद्यान्न जमा होने की इजाजत केंद्र सरकार देने जा रही है। पर इसका लाभ किसको होगा?

हाल ही में खुद केंद्र सरकार के ‘कृषि लागत एवं मूल्य आयोग’ की रबी 2020-21 की रिपोर्ट में उन्होंने यह आरोप सरकार पर लगाया कि वह किसानों से दाल खरीद कर स्टॉक करती है और जब दाल की फसल आने वाली होती है तो उसे खुले बाजार में बेच देती है, जिससे किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। तब क्या खेती उत्पादों के भंडारण की सीमा खत्म कर देने पर बड़ी-बड़ी कम्पनियां जमाखोरी कर किसान को नुक्सान नहीं पहुंचाएंगी?

तीसरा : 2006 में भाजपा शासित बिहार ने ए.पी.एम.सी. कानून को खत्म कर दिया था और दावा किया कि इससे कृषि क्षेत्र में निजी निवेश में बढ़ौत्तरी होगी। लेकिन बिहार में ऐसा कुछ नहीं हुआ, और आज भी किसान की हालत दयनीय है। तो पूरे देश में मोदी सरकार द्वारा ए.पी.एम.सी. एक्ट हटा देने से व मंडियों की मौजूदा व्यवस्था खारिज कर देने से क्या बड़ा बदलाव आने वाला है?

सबसे बड़ी जरूरत है कि किसान की फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बिके। आज केंद्र सरकार किसानों की लगभग 23 प्रकार की फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करती है। धान और गेहूं भी कितनी मात्रा में खरीदा जाता है? यह जान लेना जरूरी है कि साल 2019-20 में धान का उत्पादन हुआ 11.70 करोड़ टन। पर मोदी सरकार ने समर्थन मूल्य पर खरीदा मात्र 426 लाख टन, यानि 36.41 प्रतिशत। गेहूं का उत्पादन हुआ 10.60 करोड़ टन। पर सरकार ने समर्थन मूल्य पर खरीदा, 341 लाख टन यानि 32.17 प्रतिशत। इसी प्रकार देश में मोटा अनाज पैदा हुआ 4.50 करोड़ टन। पर सरकार ने समर्थन मूल्य पर खरीदा मात्र 1.07 लाख टन, यानि 0.22 प्रतिशत। इसका मतलब है कि गेहूं, धान व मोटे अनाज के कुल उत्पादन का मात्र 22.9 प्रतिशत सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर खरीदा गया। 

आईए अब प्राइस सपोर्ट स्कीम के तहत दालों की खरीद, खरीफ और रबी सीजन 2018-19 और 2019-20 का अवलोकन करें। मोदी सरकार ने समर्थन मूल्य पर 23.6 लाख टन चना खरीद स्वीकृत की और  खरीदा मात्र 7.7 लाख टन। तुअर दाल की 8 लाख टन की खरीद स्वीकृति के बावजूद मात्र 3.2 लाख टन ही खरीदी गई। उड़द दाल की 7 लाख टन की स्वीकृति के बावजूद 4.4 लाख टन ही समर्थन 

मूल्य पर खरीदी गई अर्थात ये स्पष्ट है कि किसानों की 75 प्रतिशत उपज बाजार के भरोसे होती है। मोदी सरकार को चाहिए था कि वह नीति को इस प्रकार से आकार दे कि किसानों को फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल पाए। पर मिली केवल कानून बनाने और बदलने की एक कागजी घोषणा।

अंतत: इस महामारी में किसानों की रबी फसल के व्यापक नुक्सान के प्रति केंद्र सरकार ने जो संवेदनहीनता दिखाई है, वह नाकाबिले बर्दाश्त है। अब भी समय है कि मोदी सरकार आगे बढ़कर किसानों को 10,000 रु. प्रति एकड़ की नकद सहायता, न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करे, खाद- कीटनाशक दवाई- खेती के उपकरणों से जी.एस.टी. हटाए, डीजल पर लगाए 16 रु. अतिरिक्त टैक्स को वापस ले तथा खरीफ फसलों के लिए प्रभावी तौर से खाद-बीज-कीटनाशक दवाई आदि उपलब्ध करवाए। ये प्रभावी कदम ही मौजूदा सरकार को ‘किसान विरोधी’ तगमे से ‘किसान मित्र’ तक का सफर तय करवाएंगे।

- रणदीप सिंह सुर्जेवाला (लेखक सुप्रीमकोर्ट के वकील एवं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता व प्रभारी हैं।)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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