Thursday, Jan 27, 2022
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The farmer said what was the victory and whose defeat

किसान बोले कैसी जीत और किसकी हार, सरकार ने मांगे मान ली बस यही सुकून है

  • Updated on 12/9/2021

नई दिल्ली/टीम डिजीटल। किसान आंदोलन को लेकर किसान संगठन और सरकार के बीच तकरार 1 साल लंबी चली। दोनों पक्षों में बर्फ पिघलने की शुरूआत उस वक्त हुई। जब पीएम मोदी ने कृषि कानून वापस लेने की घोषणा। वीरवार को सरकार ने आधिकारिक तौर पर किसान संगठनों की लगभग हर शर्त को मान लिया है। इतने लंबे संघर्ष के बाद किसानों को सुकून तो है। लेकिन वह इसे अपनी जीत मानने को तैयार नहीं है। गाजीपुर बॉर्डर पर लगभग हर किसान का यही मानना है कि बेशक उनकी शर्तें मान लीं गईं। लेकिन यह आंदोलन हार जीत का था ही नहीं। 

हरिद्वार के रहने वाले और भाकियू के गढवाल मंडल के संगठन मंत्री मौहम्मद इकबाल चौधरी का कहना था कि सरकार बेशक झुक गई है। मगर यह देरी से लिया गया निर्णय है। किसान आंदोलन और किसानों को बदनाम करने की साजिशें की गईं। हमें आतंकवादी और खालस्तानी कहा गया। 7 सौ से ज्यादा किसानों को अपनी जान गंवानी पड़ी। इतना होने के बाद यह जीत उस चोट पर मरहम नहीं लगा सकती। हां थोड़ा सुकून जरूर है। 

ऐसी ही राय मुजफ्फरनगर के रहने वाले अशोक गातियान रखते हैं। वह 26 नंवबर 2020 को राकेश टिकैत के साथ ही मुजफ्फरनगर से गाजीपुर बॉर्डर पर चले थे। उनका कहना था कि अब जीत की खुशी उतनी नहीं है। कितने परिवारों ने अपने लोगों को खोया है। सरकार ने कोई मौका नहीं छोड़ा जब हमें बदनाम करने की कोशिश ना की हो। किसानों की मांगों को मान लिया गया। यह जरूर खुशी की बात है। 

एटा के रहने वाले ओम प्रकाश ने कहा कि यह फैसला सरकार ने किसानों के दुख को देखकर नहीं बल्कि चुनावों को देखकर लिया है। जब सरकार को नजर आने लगा कि अब आने वाले चुनावों में हार को कोई नहीं रोक अगर किसानों की मांगे ना मानी। तब जाकर सरकार ने झुकने का फैसला किया। इसलिए अभी भी संदेह है कि यह सरकार किसानों के हक में आगे कुछ करेगी। 
 

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