Sunday, Jan 23, 2022
-->
The one who lit the lamp got the title of Roshan Chirag-e-Delhi

चिराग जलाने वाले को मिला रोशन चिराग-ए-दिल्ली का खिताब

  • Updated on 12/7/2021

नई दिल्ली। अनामिका सिंह। आप जब भी दक्षिणी दिल्ली की ओर जाते होंगे तो एक बात आपको जरूर सोचने पर मजबूर करती होगी कि आखिर ये चिराग दिल्ली का नाम कैसे और कब पडा। तो आज हम आपको बताने जा रहे हैं इसके पीछे की जुडी ऐतिहासिक कहानी, जिसकी वजह से एक सूफी संत नसीरूद्दीन महमूद चिराग देहलवी के नाम से इस इलाके का नाम चिराग दिल्ली पडा। बता दें कि उन्हें रोशन चिराग-ए-दिल्ली की यह उपाधि सूफी संत और चिराग देहलवी के गुरू निजामुद्दीन औलिया ने उन्हें दी थी।
दिल्ली में भी हैं सम्राट अशोक के शिलालेख

सूफी चिराग दिल्ली ने पानी घडों में भरकर उससे दीया जलाया था
सूफी चिराग दिल्ली 14वीं शताब्दी के एक रहस्यवादी कवि और चिश्ती आदेश के सूफी संत थे और निजामुद्दीन औलिया के उत्तराधिकारी भी। इतिहास के अनुसार वो दिल्ली के आखिरी महत्वपूर्ण चिश्ती आदेश के सूफी रहे। ऐतिहासिक कहानी के अनुसार जब औलिया दरगाह के अहाते में एक बावली बनवा रहे थे तो उसी समय सुल्तान ग्यासुद्दीन तुगलक अपना तुगलकाबाद का किला बनवा रहा था। उन्होंने कारीगरों को बावली में काम करने से मना कर दिया तो कारीगर रात को बावली बनाने लगे। ऐसा करने पर तुगलक ने तेल बेचने पर रोक लगा दी ताकि दीए ना जल पाएं। तब औलिया के शिष्य नसीरूद्दीन महमूद ने बावली का पानी घडों में भरा और उससे दीया जला दिया। इससे खुश होकर औलिया ने उन्हें रोशन चिराग-ए- दिल्ली की उपाधि दी थी। कहते हैं कि उनके पास अल्लाह से मिली कई शक्तियां थीं लेकिन उन्होंने इसे किसी को भी जीते जी नहीं दिया जबकि उनके 1400 से अधिक शिष्य थे। सूफी चिराग दिल्ली को साल 1324 में निजामुद्दीन औलिया के बाद सूफी संत और चिश्ती वंश की गद्दी मिली थी।

सूफी ने दिल्ली में कायम की राजनीतिक स्थिरता
कहते हैं कि ग्यासुद्दीन तुगलक की मौत के बाद फिरोजशाह तुगलक को गद्दी पर बैठाने का विशेष श्रेय सूफी चिराग दिल्ली को जाता है। यही वजह है कि फिरोजशाह तुगलक उनके काफी करीब भी थे। यही नहीं वो खुद फिरोजशाह तुगलक की ताजपोशी के दौरान भी उपस्थित थे। उनकी दरगाह का निर्माण तुगलक घराने के अगले वारिस मोहम्मद बिन तुगलक ने करवाया था।

खुद चुनी थी सूफी ने अपने लिए कब्र की जगह
इतिहासकारों का कहना है कि सूफी चिराग दिल्ली की मौत साल 1356 में ही हो गई थी लेकिन उन्होंने अपनी मौत से पहले दरगाह बनाने के लिए जगह चुन ली थी। जिसे बाद में मोहम्मद बिन तुगलक ने बनवाया। यहां गुरूवार को मेला लगता है। यही नहीं उनके चाहने वालों व शिष्यों की कब्रें भी यहीं पर स्थित है। बाबा फरीद की पोती की कब्र भी यहीं है।

अवध से आकर दिल्ली को किया रोशन
बता दें कि सूफी चिराग दिल्ली का जन्म साल 1274 में उत्तर प्रदेष के अवध यानि अयोध्या में हुआ था। उनके पिता याहया अल फारूखी पश्मीना का कारोबार करते थे और मूलतः वो ईरान से थे। जहां से वो लाहौर औश्र बाद में अयोध्या और पिता की मृत्यु के बाद 9 साल की उम्र में अब्दुल करीम शेरवानी और फिर इफ्तिखारउद्दीन गिलानी से शिक्षा प्राप्त की। 40 साल की उम्र में वो अवध छोडकर दिल्ली आ गए और औलिया के शिष्य के रूप में जिंदगी भर रहे और बाद में उनकी गद्दी संभाली।
 

comments

.
.
.
.
.