अमेरीका-रूस आई.एन.एफ. संधि से पीछे हटे फिर शुरू होगी परमाणु हथियारों की होड़?

  • Updated on 2/4/2019

2 फरवरी को रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने घोषणा की कि वह अमरीका के फैसले की प्रतिक्रिया के तौर पर आई.एन.एफ. संधि को निलंबित कर रहे हैं।

दरअसल 1987 में तत्कालीन सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाच्योव तथा अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन द्वारा ‘इंटरमीडिएट-रेंज न्यूक्लियर फोर्सेज ट्रीटी’ (आई.एन.एफ.) पर हस्ताक्षर से 1980 के दशक का वह अंतर्राष्ट्रीय संकट हल हुआ था जिसकी शुरूआत सोवियत संघ के 3 परमाणु हथियार ले जा सकने वाली ‘एस.एस.20’ मिसाइलों की यूरोप में तैनाती से हुई थी। इसका जवाब अमरीका ने यूरोप में क्रूज तथा पेॄशग-2 मिसाइलों की तैनाती से दिया था। 

अमरीका-सोवियत संघ के बीच इस संधि से पहले तक इन मिसाइलों को दोनों देशों के बीच परमाणु युद्ध छिडऩे की सबसे बड़ी वजह के रूप में देखा जाता था क्योंकि परमाणु हथियारों से लैस ये मिसाइलें महज 10 मिनट में हमला कर सकती थीं। यह स्थिति सोवियत संघ के लिए अधिक ङ्क्षचताजनक थी क्योंकि उसके जवाबी हमला करने से पहले अमरीकी मिसाइलें उसके विभिन्न ठिकानों को निशाना बना सकती थीं। 

इसी कमी से पार पाने के लिए उसने अमरीका पर परमाणु मिसाइलों के हमले के लिए लीडरशिप के आदेश की जरूरत को खत्म करके रेडिएशन तथा सीस्मिक सैंसरों के आधार पर इन्हें छोडऩे का बंदोबस्त कर दिया था।

यह संधि 500 से 5500 किलोमीटर तक जमीन से मार करने वाली मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों के परीक्षण और तैनाती को रोकती थी । इसके अंतर्गत पहली बार इन दो महाशक्तियों ने अपने परमाणु शस्त्रागार को कम करने और परमाणु हथियारों की एक पूरी श्रेणी को समाप्त करने पर सहमति व्यक्त की थी।

इस संधि के ही परिणामस्वरूप दोनों देशों ने 1 जून, 1991 की संधि में तय समयसीमा के अनुसार कुल 2692 छोटी तथा मध्यम श्रेणी की मिसाइलों को नष्ट कर दिया था।परंतु शुक्रवार को अमरीका ने इस संधि को स्थगित करने की घोषणा कर दी थी जिसके जवाब में अगले ही दिन शनिवार को रूस ने भी इस संधि से अलग होने की घोषणा कर दी।

अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने शुक्रवार को आरोप लगाया था कि रूस वर्षों से इस समझौते का न केवल उल्लंघन करता रहा है बल्कि यूरोप की सीमा के निकट मिसाइल लांचर्स तैनात कर माहौल खराब करने की कोशिश भी उसने की है।

180 दिनों का समय देते हुए रूस को कहा गया कि अगर वह नियमों का पालन नहीं करता है तो अमरीका को मजबूरी में इस समझौते से अलग होना होगा और एक बार समझौता पूरी तरह टूटने से रूस को इसका खतरनाक खमियाजा भुगतना पड़ सकता है।

हालांकि, रूस ने भी अपनी मंशा जाहिर करने में देर नहीं की और अमरीका के सभी आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि यूरोप की सीमा पर तैनात उसकी मिसाइलों ने कभी इस संधि का उल्लंघन नहीं किया है। साथ ही उसने चेतावनी दी कि अगर यूरोप की सीमा पर अमरीका मिसाइल तैनात करता दिखा तो उसके लिए गम्भीर परिणाम हो सकते हैं और अमरीका यदि यूरोप में नई मिसाइलों को तैनात करता है तो वह भी इससे पीछे नहीं हटेगा और उसे नई मिसाइलें बनाने में भी अधिक वक्त नहीं लगेगा। \

गौरतलब है कि ईरान के साथ न्यूक्लियर डील रद्द करने के बाद ट्रम्प प्रशासन का यह दूसरा ऐसा सबसे बड़ा फैसला है जो निकट भविष्य में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को बहुत प्रभावित कर सकता है। इससे पहले 2002 में अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने ‘एंटी बैलिस्टिक मिसाइल’ संधि से अमरीका को बाहर कर लिया था।

वास्तव में अब आई.एन.एफ. से अमरीका के अलग होने की एक वजह चीन भी है क्योंकि इस संधि के चलते ही चीन के बढ़ते सैन्य प्रभाव पर लगाम कसने के लिए उसके निकट परमाणु मिसाइलें तैनात करना अमरीका के लिए सम्भव नहीं था। शायद अमरीका को रूस से अधिक ङ्क्षचता अब चीन की सैन्य ताकत की है। 

वहीं अमरीका तथा रूस के बीच अब यूरोपीय देशों के पिसने की स्थिति बन सकती है जो इसे तोड़े जाने का हमेशा पुरजोर विरोध करते रहे हैं। गौरतलब है कि 2014 में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने रूस द्वारा एक क्रूज मिसाइल के परीक्षण के बाद उस पर आई.एन.एफ. संधि के उल्लंघन का आरोप लगाया था।

कहा जाता है कि ओबामा ने यूरोपीय नेताओं के दबाव में इस संधि को नहीं तोडऩे का फैसला किया था। डर है कि हथियारों की होड़ पर शीत युद्ध के बाद जो लगाम लगी थी वह होड़ कहीं फिर से न शुरू हो जाए।         ---विजय कुमार

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