Wednesday, Jun 26, 2019

नरेंद्र मोदी सरकार आने को लेकर क्या है नेपाल के इरादे ?

  • Updated on 5/21/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। लोकसभा चुनाव के दौरान पूरे देश की नजर चुनाव के परिणामों पर रहती है परन्तु साथ ही पड़ोसी देश नेपाल की भी नजर इस बार लोकसभा चुनावों पर बनी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब सत्ता में आए थे तो काठमांडू के साथ रिश्ते उतार-चढ़ाव के दौर में थे। परन्तु पांच वर्षों के कार्यकाल के अंत तक दोनों देशों के संबंध संतोषजनक स्थिति में आ गए  हैं।

नरेन्द्र मोदी के पीएम बनने के बाद जब नेपाल का पहला दौरा किया था तब लोग सड़कों पर उनकी एक झलक पाने के लिए भारी संख्या में उमड़े थे। साथ ही नेपाल की संसद में मोदी के भाषण को खूब सराहा गया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नेपाल का काफी अच्छा रिश्ता कायम हो गया था। परन्तु कुछ समय बाद ही नेपाल में मोदी के लिए प्यार की जगह विरोध दिखने लगा।

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नेपाल के नए संविधान में भारतीय मूल के मधेशियों के अधिकारों को नजरअंदाज किए जाने पर भारत द्वारा नाराजगी जताई गई थी। बता दें की मधेशियों के आंदोलन की वजह से भारत-नेपाल सीमा पर आर्थिक नाकेबंदी हो गई थी जिसके लिए नेपाल ने मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।

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आपको बता दें की सीमा पर आर्थिक नाकेबंदी की वजह से नेपालियों की दैनिक जरूरतों की चीजों की आपूर्ति का संकट पैदा हो गया था जिससे वहां मोदी विरोधी भावनाएं और अधिक मजबूत हो गईं।

2015-16 में भारत-नेपाल सीमा पर हुई आर्थिक नाकेबंदी की प्रतिक्रिया में नेपाल चीन के करीब चला गया। नेपाल प्रमुख ओली ने चीन के साथ ट्रांजिट और ट्रांसपोर्ट समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसका मतलब था कि नेपाल की आपूर्ति व्यवस्था पर अब भारत का एकाधिकार खत्म हो जाएगा।

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नेपाल के राजनेता कांग्रेस को बीजेपी से अधिक प्राथमिकता दे रहे है। वर्तमान की चीन समर्थक ओली सरकार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एक चुनौती की तरह देखा जा रहा है।

एक साल बाद मोदी सरकार ने जब नोटबंदी का ऐलान किया तो फिर एक बार दोनों देशों के बीच दूरियां हो गईं थी, नेपाल के भीतर नोट बदलने की सुविधा मौजूद ना होने की वजह से आम लोगों को बहुत नुकसान का सामना करना पड़ा था। भारत के वादे के बावजूद भारतीय रिजर्व बैंक नेपाली समकक्ष बैंक नेपाल राष्ट्र बैंक के साथ इस मुद्दे को सुलझाने में नाकामयाब ही रहा है।

जानकारी के लिए बता दें की नेपाल में केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (NCP)के पास संसद में पांच वर्ष के लिए पूर्ण बहुमत है जिससे नेपाल भारत की नई सरकार के साथ ठोस कदम आगे बढ़ाए जाने की संभावना है।
वहीं नेपाल सरकार किसी तीसरे देश से स्वतंत्र तौर पर सैन्य उपकरण खरीदने का अधिकार चाहती है। हालांकि 1950 की संधि के अनुच्छेद 5 के तहत नेपाल को किसी तीसरे देश से सैन्य हथियार आयात करने से नहीं रोकता है लेकिन LoE (लेटर ऑफ एक्सचेंज) में कुछ शर्तें भी दी गई हैं। LoE के दूसरे पैराग्राफ में कहा गया है कि नेपाल किसी भी देश से हथियार और युद्ध सामग्री खरीदने से पहले भारत सरकार से मदद और सहमति लेनी होगी। परन्तु नेपाल इसे लेकर अक्सर अपनी आपत्ति जताता आया है। 1989 में जब नेपाल के राजा बीरेंद्र ने जब चीन से सैन्य उपकरण आयात किए तो काठमांडू पर संधि के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था।


  

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