Tuesday, May 17, 2022
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तालिबानी कंट्रोल के बाद मुश्किल में पड़ा दिल्ली का अफगानी स्कूल

  • Updated on 8/26/2021

नई दिल्ली,टीम डिजिटल । राजधानी के भोगल में घरों और व्यावसयिक इमारतों की कतार में पतंजली स्टोर के बराबर और नीचे बेसमेंट मे सैयद जमालुद्दीन अफगान स्कूल है,जो देश का एकमात्र अफगान स्कूल है। हालांकि बाहरी लोगों को तो छोडि़ए बहुत से स्थानीय लोगों को भी इस स्कूल की जानकारी नहीं है। मगर देश में रहने वाले अफगान समुदाय के लिए यह एक आशा की किरण है,जो उन्हें नई रोशनी दिखाती है।  मगर अफगानिस्तान में तालिबानी कब्जे के बाद स्कूल पर भी संकट के बादल छाए हुए हैं, और पिछले दो तीन दिन से स्कूल बंद है।

1994 में स्थापित किया गया था स्कूल
स्कूल प्रिंंसिपल सानिया फेडा ताज का कहना है कि स्कूल 1994 में स्थापित किया गया था और गैर सरकारी संगठन महिला फेडरेशन फॉर वर्क से संबंधित था। इसके बाद 2000 के दशक की शुरुआत में, एनजीओ द्वारा स्कूल को बंद कर दिया गया था। ताज ने स्कूल को फिर से शुरू किया और अच्छे समद्ध लोगों के सहयोग से कक्षाएं एक बार फिर से शुरू हो गईं। इसे अफगान सरकार से वित्तीय सहायता मिलती थी। स्कूल प्रिंसिपल के अनुसार वर्तमान में स्कूल में पहली से कक्षा 12 तक 500 से ज्यादा छात्रों का पंजीकरण है।
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वेतन के साथ ही रेंट एग्रीमेंट के लिए भी चाहिए पैसा
स्कूल वित्तीय सहायता के लिए अफगान सरकार पर निर्भर था,मगर तालिबान के कब्जे के बाद सब बदल चुका है। वित्तीय सहायता नहीं मिल रही है। जबकि स्कूल में 26 शिक्षकों सहित 36 स्टाफ सदस्यों के वेतन के साथ ही रेंट एग्रीमेंट के लिए भी पैसा चाहिए। उन्होंने बताया कि स्कूल किराए के भवन में चल रहा है। हर साल रेंट एंग्रीमेंट रिन्यू होता है पहले सरकार पैसा भेजती थी जिसमें सालभर का पैसा जमा करा देते थे। अफगानिस्तान के वर्तमान हालात को देखते हुए फिलहाल हमने पिछले तीन दिन से स्कूल बंद किया हुआ है और हम दोबारा से स्कूल खोलने के लिए अभी वहां नई सरकार का इंतजार कर रहे हैं कि सरकार बनने पर तालिबानी देंगे या नहीं । यहां के खराब हालात का यहां भी विपरित असर पड़ा है। हालांकि स्कूल प्रिंसिपल ने छात्रों को पढ़ाई जारी रखने और स्कूल खोलने का आश्वासन दिया है। साथ ही उनका कहना है कि वह इस स्कूल को बंद नहीं करना चाहती हैं। अगर अफगान सरकार इस स्कूल को बंद भी कर दे तो भी मैं इसे दूसरी जगह खोलेंगे ताकि शरणार्थी छात्र अपनी मातृभाषा सीख सकें।

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