Sunday, Nov 28, 2021
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नेपाल के बवाल में भारत का हथियार बनेगा चीन, भारी पड़ेगी भारत की कूटनीति

  • Updated on 6/2/2020

नई दिल्ली टीम डिजिटल। नेपाल (nepal) ने लिंपियाधुरा (limpiadhura), कालापानी (kalapani) और लिपुलेख (lipulekh) पर अपना हक जमाने के बाद बेवजह एक सोए हुए विवाद को तीली दिखाने की कोशिश की है। माना जा रहा है कि ये बेजा हरकत नेपाल ने चीन (china) के इशारे पर ही की है। लिहाजा अब भारत भी चीन के साथ अपने करार को ही नेपाल का जवाब बनाने जा रहा है। दरअसल 1991 में भारत और चीन के बाच लिपुलेख को कारोबार का प्वाइंट बनाने पर समझौता किया था। इस बात को तीस साल बीत चुके हैं और नेपाल ने कभी इस पर ऐतराज नहीं जताया। अब अपनी कोई दलील देने की जगह भारत चीन के इन्हीं दस्तावेजों को नेपाल को दिखाकर चीन का इस्तेमाल करने के मूड में है।

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नेपाली संसद में भारत के इलाकों पर हक जमाने की बेजा कोशिश
नेपाली संसद में प्रस्ताव रखकर भारत के लिंपियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख पर अपना हक जमाने की कोशिश की जा रही है। पूरी दुनिया में नेपाल की इस बेजा हरकत का मजाक बनाया जा रहा है वहीं हिंदुस्तान के रहमो-करम पर पलने वाले नेपाल की ये बेजा हरकत भारत के लिए भी चौंकाने वाली थी। नेपाल के इस रुख के पीछे नेपाल की सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का दखल माना जा रहा है। मगर अब भारत ने चीन की इस चाल के जवाब में चीन के ही दस्तावेज रखने का प्लान तैयार किया है।

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खुद चीन ने ही 1991 में लिपुलेख को माना था हिंदुस्तान का हिस्सा
चीन नेपाल के जरिए भारत को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहा है। मगर खुद चीन के साथ 1991 में भारत ने सीमा पर कारोबार की संधि की थी। इस संधि के लिए लिपुलेख को ही बॉर्डर ट्रेडिंग प्वाइंट बनाया गया था। चीन के प्रधानमंत्री ली पेंग ने भारत यात्रा के दौरान इस समझौते को साइन भी किया था। 1992 में प्रोटोकॉल फॉर एंट्री एंड एक्जिट प्रोसीजर पर भी चीन के दस्तखत हैं। इसमें भी लिपुलेख को भारत का  हिस्सा माना गया है।

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नेपाल के कंधे पर रखी बंदूक से चीन का शिकार करेगा भारत
तीस सालों तक नेपाल ने इस समझौते पर कभी ऐतराज नहीं जताया। आज भी यहां पर भारत का ही कब्जा है। 11 अप्रैल 2005 में भी चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ और भारत के तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह ने ईस्टर्न सेक्टर में किबिथू-दमाई और मिडल सेक्टर में लिपुलेख पास/कियांग ला को इसमें शामिल करने के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। ऐसे में अगर खुद चीन ही नेपाल के कंधे पर बंदूक रखकर भारत को परेशान  करना चाह रहा है तो यही बंदूक अब भारत नेपाल और चीन दोनों पर तान सकता है।

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भारत ने चीन को बनाया विवाद का हिस्सा, गवाही में चीन के दस्तावेज
लिहाजा ना चाहते हुए भी अब चीन को इस विवाद का हिस्सा भी बना दिया और चीन के प्रधानमंत्री के दस्तखत ही उसके खिलाफ इस्तेमाल भी कर सकेगा। जाहिर है, बिना प्रयास किए अब वो नेपाल को जवाब दे सकता है वहीं चीन के हस्ताक्षर वाले दस्तावेज को चीन की अनदेखी चाल के जवाब में रखेगा। अब भी अगर चीन ने नेपाल को समर्थन दिया तो उसे अपने ही पीएम के हस्ताक्षरों और इन समझौतों को भी झुठलाना पड़ेगा। नेपाल के सहारे चीन की ये बाजी अब चीन को ही भारी पड़ने जा रही  है। जाहिर है, भारत की ये कूटनीति नेपाल के लिए भी अब अबूझ पहेली बनने जा रही है।  

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