Sunday, Dec 08, 2019
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दुनिया के पांच विचित्र स्कूल, जहां बच्चों को बोझ नहीं लगता है बस्ता

  • Updated on 12/2/2019

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। जब हम किसी स्कूल में प्राथमिक शिक्षा ग्रहण कर रहे होते हैं तो किताब-कॉपियों से बैग बोझ बन जाता है। इसके कारण कई बच्चों को पढ़ाई में मन भी नहीं लगता है। जिसके कारण बच्चे के मन में चिरचिरापन आने लगता है। लेकिन क्या आप जानते हैं दुनिया में कई स्कूल ऐसे भी हैं, जहां बच्चों को पढ़ाई में मन लगाए रखने के लिए अलग-अलग तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं।

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द ट्रेन प्लेटफार्म स्कूल – भारत
यहाँ उन बच्चों को स्कूल ले जाया जाता है, जो शिक्षा का खर्च नहीं उठा सकते है। यह उत्कृष्ट पहल एक भारतीय शिक्षक इंद्रजीत खुराना द्वारा की गई थी, जो सड़कों पर भीख माँगने वाले बच्चों की मदद और शिक्षा के लिए थे। बच्चों को स्कूल ले जाना, यह एक अनूठी पहल 4,000 छात्रों के साथ-साथ उनके परिवारों को भोजन और दवा प्रदान करती है।

झोंगडोंग: द केव स्कूल- चीन
चीन (China) का यह स्कूल करीब 186 छात्रों को शिक्षा देता था और इसमें 8 शिक्षक पढ़ाते थे। दरअसल, यह स्कूल एक प्राकृतिक गुफा के अंदर था, जिसे साल 1984 में खोजा गया था। यहां पर ऐसे बच्चों को शिक्षा दी जाती थी, जो स्कूल नहीं जा सकते, लेकिन साल 2011 में चीन की सरकार ने इस स्कूल को बंद करवा दिया। 

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द स्कूल ऑफ सिलिकॉन वैली- यूएसए
यह स्कूल पढ़ाई के परंपरागत तरीकों के बिल्कुल खिलाफ है। यहां पर बच्चों की पढ़ाई के लिए उच्च स्तर की तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। यहां पर बच्चों को आई पैड, थ्री-डी मॉडलिंग और संगीत की मदद से पढ़ाया जाता है। 

मकोको फ्लोटिंग स्कूल- नाइजीरिया
कई जगहों पर ऐसा देखने को मिलता है कि स्कूलों की कमी या दूर होने की वजह से बच्चे पढ़ने नहीं जा पाते, । यहां एक ऐसा स्कूल है, जो पानी पर तैरता रहता है। इसमें एक बार में 100 बच्चे पढ़ाई करते हैं। यह स्कूल पानी के घटते-बढ़ते जल स्तर पर भी आराम से टिका रहता है और खराब मौसम भी इसे कोई नुकसान नहीं पहुंचा पाता। 

द कार्पे डियम स्कूल
यह स्कूल ओहिओ में स्थित है। यहां क्लासरूम की जगह करीब 300 क्यूबिकल हैं, बिल्कुल किसी ऑफिस की तरह। इस स्कूल का यह मानना है कि हर किसी को अपने स्तर पर चीजें सीखनी चाहिए। अगर बच्चों को किसी तरह की कोई परेशानी होती है तो इंस्ट्रक्टर आकर तुरंत उनकी मदद कर देते हैं।

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सडबरी स्कूल
यह स्कूल अमेरिका (America) में है। इस स्कूल के बच्चे खुद अपना टाइम टेबल बनाते हैं और साथ ही खुद यह तय करते हैं कि उन्हें किस दिन क्या पढ़ना है। साथ ही उन्हें पढ़ाई करने के कौन से तरीके अपनाने हैं और वो खुद को किस तरह से आंकना चाहते हैं यह भी स्कूल के बच्चे ही तय करते हैं। 

द जेंडर-न्यूट्रल स्कूल – स्वीडन
इस स्कूल में ‘लड़का’ या ‘लड़की’ की कोई अवधारणा नहीं है। सभी बच्चों के साथ समान व्यवहार किया जाता है और उन्हें ‘वे’ कहा जाता है। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य और रूढ़ियों से लड़ने के लिए बहुत जोर दिया।

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