Monday, Mar 30, 2020
the doors of heart locked in the streets of gates

गेटेड गलियों में भिड़ते दिल के दरवाजे

  • Updated on 3/4/2020

नई दिल्ली (अकु श्रीवास्तव/ टीम डिजिटल)। जाफराबाद (jafrabad), शिवविहार (करावल नगर) समेत दिल्ली के उत्तर पूर्व की तमाम तंग गलियों में सन्नाटा है। थोड़ी-थोड़ी दूर पर टूटी-फूटी चीजों और जले सामानों का मलबा है। यहां क्या हुआ होगा? यह मलबा इसकी गवाही देता है। इन मोहल्लों की कई गलियों से जब आप प्रवेश करेंगे तो नज़ारे लगभग एक से दिखेंगे। गली नंबर 1, 2, 3....34, 35...। हर गली पर आपको लोहे का मजबूत गेट मिलेगा।

घरों पर लोहे के दरवाजे, गलियों में मजबूत गेट
लोगों के घरों के दरवाजे भी लोहे के बने हैं। फिर भी उनमें से बहुत से अब टूटे हुए हैं। यह लोहा और दरवाजे दिलों में पैठे अविश्वास की कहानी कह रहे हैं। यह अविश्वास और डर एक दिन में पैदा नहीं हुआ। शायद वर्षों से चला आ रहा है। अगर लोहे से मजबूत कोई और धातु इन्हें उपलब्ध होती तो लोग उसके दरवाजे भी बनाते। मगर इतना लोहा कहां से लाओगे, जो दिलों को बांट दे। शायद ऐसे ही लोहे के मजबूत बंद दरवाजों और पनपते अविश्वास को देख शायर जव्वाद शेख ने इंसान की फितरत को इस शेर में ढाला होगा-

‘मैं अब किसी की भी उम्मीद तोड़ सकता हूं, मुझे किसी पे भी अब कोई एतिबार नहीं।’

लोहे के दरवाजों में कैद होती जिंदगी
गलियों के ये लोहे के गेट हर सुबह खुलते हैं और अंधेरा बढ़ते ही रात में बंद कर दिए जाते हैं। मगर इन गेटों के खुलने और बंद होने के बीच जीवन रोज अपने सभी रंगों को जीता है। बहुत से इश्क भी परवान चढ़ते हैं। शिव विहार में राधिका की जुनैद से शादी होने वाली थी। दोनों के परिवार भी राजी हो गये थे। राधिका की पहली शादी लंबी नहीं चली। तलाक के बाद वह अपने मायके में ही रह रही थी। जुनैद का जीन्स का कारोबार है। इन तंग गलियों में समुदायों और लोगों के बीच यह आपसी अविश्वास कैसे पैदा हुआ? किसने पैदा किया? कब पैदा हो गया? ऐसे बहुत से सवाल हैं, जिनके जवाब इन गलियों में कहीं नहीं मिलेंगे।

भरोसे से मिलती थी सुरक्षा, अब भरोसा कहां बचा...
कुछ अटकलें हैं जो लोग और बुद्धिजीवी हमेशा से लगाते रहे हैं। कुछ अतीत की घटनाओं और कुछ नेताओं की बातों ने यह अविश्वास बनाया है। लोगों को भरोसा जितना कमजोर हुआ, दरवाजे उतने ही मजबूत हुए। जुनैद के अब्बा मोहम्मद राशिद का कहना है कि परस्पर भरोसा ही आदमी को सुरक्षा देता है। अगर भरोसा टूटा तो फिर कोई भी दरवाजा इतना मजबूत नहीं है, जो इंसान और इंसानियत की सुरक्षा कर सके।  फिर निकाह के बाद तो लगता है कि हमारा जीना हराम हो जाएगा। डर हमेशा रहेगा कि कोई हमें मार न डाले।

दहशत में परिवार, मोहल्ले की निगाहों में शक
परिवार दहशत में होगा और मोहल्ला हमेशा शक की निगाहों से देखेगा , जो हम नहीं चाहते।  हमें एक-दूसरे का भरोसा जीतने के लिए कदम उठाने होंगे। इन गलियों को आज इसकी बहुत जरूरत है। आते-जाते नजरें मिलीं। इश्क का रंग चढ़ा। पहले-पहल दोनों के परिवार इस रिश्ते से राजी नहीं थे मगर दोनों का प्रेम देख शादी के लिए हां कर दी गई। 2 मार्च की शादी भी तय हो गई थी (मामला अदालत में भी था) मगर इससे पहले इलाके में हिंसा हो गई। जो दिल बेखौफ मिलते थे, उनकी आंखों में अविश्वास और डर के नए डोरे आ गए। अब दोनों के परिवार वाले ये शादी नहीं चाहते।

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